क्या मांस खाना सही है या गलत | क्या ब्राह्मण को मांस खाना चाहिए

 

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आजकल मांसाहारी भोजन की खपत बहुत तेजी से हो रही है। 

हिंदुओ में भी खासकर ब्राह्मण भी आजकल मांसाहार का सेवन बहुत कर रहे हैं 

और अगर आप उनसे मांसाहार भोजन खाने का तर्क पूछेंगे तो वो अजीब अजीब से तर्क दे देंगे। 

क्या किसी निरीह जानवर को मारकर खाना वो भी सिर्फ स्वाद के लिए कहां तक उचित है? 

हमारे हल्का सा भी चोट लगने पर हम डॉक्टर की तरफ भागते है और अपने स्वाद के लिए किसी की हत्या कर देते हैं। 

अगर कोई हमारे परिवार के किसी सदस्य को मारकर खा जाए तो आपको कैसा लगेगा।  

 

हमारा शरीर शाकाहार के लिए बना है मांसाहार के लिए नहीं 

 
प्रत्येक शाकाहारी और मांसाहारी जीवों के शरीर की रचनाए अलग अलग होती है जैसे -:

1) मांसाहारी की आंखें अंधेरे में देख सकती हैं और जन्म के पांच या छह दिन बाद खुलती है जबकि शाकाहारी की आंखे अंधेरे में नहीं देख सकती और जन्म के समय खुल जाती हैं।

2) मांसाहारी की सूंघने की क्षमता बहुत ज्यादा होती है क्युकी उनको अपना शिकार करना होता है जबकि शाकाहारी की सूंघने की क्षमता बहुत कम होती है।

3) मांसाहारी के सुनने की क्षमता बहुत होती है और उनके कान बेहद संवेदनशील होते हैं जबकि शाकाहारी की सुनने की क्षमता सामान्य होती है।

4) मांसाहारी के दांत नुकिले होते है और दांत जीवन में इक बार ही आते हैं। जबकि शाकाहारी के दांत चपटे होते है और दो बार आते है।

5) मांसाहारी जीव मांस को अपने दांतो से चीड़ फाड़ कर निगलते है और इनका जबड़ा केवल ऊपर नीचे चलता है जबकि शाकाहारी जीव अपने भोजन को पीस कर खाते है और इनका जबड़ा ऊपर नीचे दाएं बाएं भी चलते हैं।


6) मांसाहारी जीव मांस को खाते वक्त बार बार मुंह को खोलते वा बंद करते है जबकि शाकाहारी जीव एक बार निवाला लेने के बाद उसे निगलने तक मुंह बंद रखते हैं।

7) मांसाहारी जीवों के स्वाद कलिकाए बहुत कम होती है जबकि शाकाहारी जीवों की स्वाद कालिकाए बहुत ज्यादा ( मनुष्य 25,000) होती हैं।

8) मांसाहारी जानवरो की लार अम्लीय होती है जबकि शाकाहारी जीवों की लार क्षारीय होती है।

9) मांसाहारी जीवों में प्रोटीन के पाचन से काफी मात्रा में यूरिक एसिड बनता है जिसको साफ करने के लिए उनके गुर्दे बड़े आकार के होते है जबकि शाकाहारी जीवोंके गुर्दे छोटे होते है।

10) मांसाहारी जानवरों के नाख़ून नुकिले, गोल एवं लंबे होते है जबकि शाकाहारी जीवों के नाख़ून छोटे और चपटे होते है।
 
11) मांसाहारी जीव द्रव्य को(पानी) चाट कर पीते है जबकि शाकाहारी जीव पानी को घूंट में पीते है।

12) मांसाहारी को पसीना नहीं आता जबकि शाकाहारी को पसीना आता है।

13) मांसाहारी के श्वास कि रफ्तार तेज होती है जबकि शाकाहारी की श्वांस की रफ्तार धीमी होती है।
 

अब आप समझ गए होंगे कि मनुष्य का शरीर शाकाहार भोजन के लिए बना है ना की मांसाहारी भोजन के लिए। 
 
मांसाहारी भोजन करने से हम अपने शरीर के विरुद्ध ही काम करते हैं और इसका ही कारण है कि आजकल बहुत सी बीमारियां हमारे शरीर को घेर लेती हैं।
 
बहुत से लोग ये तर्क देते हैं कि जानवरों को मारकर नहीं खायेंगे तो इनकी संख्या बहुत बढ़ जायेगी तो इसके लिए आपको बता दूं कि प्रकृति को अच्छी तरह पता है कि जीवों का संतुलन कैसे बनाना है। 
 
आप कभी प्रकृति से जीत नहीं सकते। इक बहुत ही आसान से उदहारण से मै आपको समझाता हूं। 
 
 
एक किलो सब्जी उगाने के लिए सिर्फ 120 लीटर पानी का उपयोग होता है जबकि एक किलो मांस बनने में किसी जानवर में 5,000 लीटर पानी, 6-7 किलो अनाज और 50-60 किलो चारा लगता है। 
 
अब आप आसानी से समझ सकते हैं कि मांस खाना हमारे वातावरण के लिए कितना खराब है क्युकी जितने में मांस तैयार किया जाता है 
 
उतने में ना जाने कितने गुना शाकाहार तैयार हो सकता है जो कई लोगों का पेट भर सकता है वो भी प्रकृति को बिना नुकसान किए हुए।
 
आप भले ही चाहे जितने उपाय कर लें प्रकृति को बचाने कि या कितना ही ज्ञान क्यों ना दे दे 
 
लेकिन जब तक आप मांसाहार बंद नहीं करेंगे प्रकृति को होने वाले नुकसान की भरपाई नामुमकिन है। 
 
शायद अब आप मांसाहार से होने वाले नुकसान को समझ चुके होंगे।
 

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