आयरन डोम क्या है और आयरन डोम कैसे काम करता है Iron Dome Defence System

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इजरायल और फलिस्तीन के संघर्ष के बीच एक एक हैरतंगेज वीडियो सामने आया है जिसमे दिख रहा है की फिलस्तीन समर्थित आतंकवादी संगठन हमास द्वारा भेजे गए सारे मिसाइल और रॉकेट को एक मशीन हवा में ही नष्ट कर रही है। 
 
यहां दनादन दर्ज़नों रॉकेट आते दिखते हैं, मगर ये रॉकेट अपने टारगेट तक नहीं पहुंचते और बीच हवा में ही नष्ट हो जाते हैं। 
 
जो मशीन इन रॉकेट्स को हवा में ही नष्ट कर रही है उसे आयरन डोम कहते है। सबके दिमाग में यही प्रश्न आ रहा है की आयरन डोम क्या है? आयरन डोम कैसे काम करता है?
 
आयरन डोम, इज़रायल का विख़्यात मिसाइल डिफेंस सिस्टम है। ‘आयरन डोम’ एक छोटी दूरी का एयर डिफेंस सिस्टम है, जिसे रॉकेट, तोपखाने और मोर्टारों को नष्ट करने के लिए डिजाइन किया गया है।

2007 में इज़रायली रक्षा मंत्रालय ने डिफ़ेंस के लिए एक ख़ास कवच विकसित करना शुरू किया।  यहां कवच का मतलब है, मिसाइल डिफ़ेंस सिस्टम।  जैसा कि नाम से स्पष्ट है, ये डिफेंसिव हथियार है। इसका काम है दुश्मन के मिसाइल अटैक को विफल करना, उन्हें लक्ष्य तक पहुंचने से पहले नष्ट कर देना। 
 

ये बात सुनने में आसान लग सकती है मगर मिसाइलों को आकाश में ही शूट कर देना बहुत मुश्किल काम है। इसकी एक मिसाल है अमेरिका का पैट्रिअट मिसाइल डिफेंस सिस्टम।  
 
1991 में हुए पहले गल्फ़ वॉर की बात है.
 
तब अमेरिका ने अपने पैट्रिअट डिफ़ेंस सिस्टम को इज़रायली सीमा पर तैनात किया। ताकि इराक़ी मिसाइल हमलों से इज़रायल को बचाया जा सके। उस दौर में इराक के पास दो मुख्य मिसाइलें थीं और उनमें से एक एक थी, स्कड
 
ये मिसाइल सोवियत ने दी थी इराक को। स्कड एक बलिस्टिक मिसाइल थी, जिसे सोवियत ने कोल्ड वॉर के दौर में विकसित किया था। इराकी जख़ीरे में दूसरी प्रमुख मिसाइल थी, अल-हुसैन। ये स्कड मिसाइल का ही अपग्रेडेड वर्ज़न था।  

 

अमेरिकी डिफ़ेंस सिस्टम की विफलता

 

उस समय अमेरिका ने प्रचारित किया कि पैट्रिअट बेहद प्रभावी है। अमेरिका द्वारा जारी किए गए आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, पैट्रिअट ने इराक द्वारा दागी गईं करीब 94 पर्सेंट मिसाइलों को गिरा दिया। 
 
इसको आसान भाषा में समझिए, तो नुकसान को 94 पर्सेंट तक कम कर दिया।
 
लेकिन असलियत ये है कि अमेरिका ने झूठ बोला था। पैट्रिअट असल में बेहद कमज़ोर साबित हुआ था, वो इराकी मिसाइलों को रोक ही नहीं पाया। 
 
अमेरिका हथियारों का टॉप निर्यातक है। इतने बड़े युद्ध में उसका प्रचारित डिफ़ेंस सिस्टम फेल हो रहा था। शायद इसी झेंप से बचने के लिए झूठे दावे परोसे गए थे। 

ऐसे में जब इज़रायल ने मिसाइल डिफ़ेंस सिस्टम विकसित करने की योजना बनाई। इस डिफेंस सिस्टम को विकसित करने, डिप्लॉय करने और ऑपरेट करने में बहुत बड़ी रकम ख़र्च होने वाली थी।
 
कितनी रकम? 
 
समझिए कि दुश्मन के एक मिसाइल को रोकने की इसकी लागत 37 से 65 लाख रुपये के बीच आती। इतना पैसा ख़र्च करके भी अगर काम न सधे, तो क्या होगा? 
 
इन सब वजहों से कई सवाल खड़े हुए। अमेरिका ने भी इज़रायल को समझाया कि वो कोई सस्ता विकल्प खोजे। 

मगर तमाम शंकाओं के बावजूद इज़रायल ने काम जारी रखा। इसका जिम्मा मिला इज़रायल की एक कंपनी रफाएल अडवांस्ड डिफेंस सिस्टम्स को।  
 
इस प्रॉजेक्ट के लिए इज़रायल को करीब सात हज़ार करोड़ रुपए की ज़रूरत थी। इतनी बड़ी रकम अकेले मैनेज करना मुश्किल था। 
 
ऐसे में आगे आया अमेरिका, तब अमेरिका के राष्ट्रपति थे बराक ओबामा, वो चाहते थे कि इज़रायल एक सिक्योर्ड स्थिति में आए। उसका डिफेंस अप-डू-डेट हो, ताकि हमास और हेजबोल्लाह जैसे ईरान समर्थित संगठन हावी न हों। 
 
ओबामा को उम्मीद थी कि ऐसा हुआ, तो शायद सभी पक्ष शांति वार्ता की तरफ बढ़ें। शायद इसीलिए ओबामा प्रशासन ने 2010 में तमाम आपत्तियों के बावजूद अमेरिकी कांग्रेस से करीब 1,500 करोड़ रुपए का एक फंड पास करवाया। 
 
ये फंड इज़रायली डिफेंस सिस्टम विकसित करने के लिए दी गई एक क़िस्म की सब्सिडी थी। 
 
आने वाले सालों में अमेरिका ने इस मद में और भी फंडिंग दी इज़रायल को। ये वित्तीय मदद न मिलती, तो शायद इज़रायल का डिफ़ेंस सिस्टम प्रॉजेक्ट लटक जाता। 

इन कोशिशों का रिज़ल्ट आया 2011 में, अप्रैल 2011 की बात है यानी रॉकेट हमले शुरू होने के ठीक एक दशक बाद। एक रोज़ हमास ने गाज़ा वाली साइड से एक रॉकेट छोड़ा और इज़रायल ने उस रॉकेट को बीच हवा में नष्ट कर दिया।   

ये पहली बार था, जब इज़रायल ने एक शॉर्ट-रेंज रॉकेट अटैक पर इस तरह का काउंटर स्ट्राइक किया हो और ये जिसकी वजह से मुमकिन हो पाया, उसका नाम था- आयरन डोम  इज़रायल का विख़्यात मिसाइल डिफेंस सिस्टम.

 

आयरन डोम कि उपयोगिता  Usefulness of Iron Dome System

 

14 नवंबर, 2012 को इज़रायल ने एक एयरस्ट्राइक किया इसमें हमास का मिलिटरी चीफ़ अहमद जबारी मारा गया। स्पष्ट था कि हमास भी जवाबी कार्रवाई करेगा। इज़रायल को पता था कि इस बार संघर्ष और तेज़ होगा।  
 
इसकी वजह ये थी कि ईरान की मदद से इस वक़्त तक हमास के पास लॉन्ग-रेंज के रॉकेट्स आ चुके थे। वो अब टेल अविव और जेरुसलेम को निशाना बना सकता था। 

इज़रायल का अनुमान सच निकला। इस संघर्ष के दौरान नवंबर 2012 में पहली बार हमास के रॉकेट्स राजधानी टेल अविव पहुंचे। जब टेल अविव में पहली बार रॉकेट अटैक का वॉर्निंग सायरन बजा, तो भी लोगों में पैनिक नहीं फैला।  
 
क्योंकि इस वक़्त तक आयरन डोम ख़ुद को साबित कर चुका था। उसकी एक्युरेसी रेट 80 से 90 पर्सेंट के बीच थी। 
 
इसका मतलब था, इज़रायल को जान-माल का कम-से-कम नुकसान।  इसका मतलब ये भी था कि हमास के संसाधन बर्बाद हो रहे थे। उसके पास आयरन डोम का कोई तोड़ नहीं था। 
 
इसी वजह से जबारी की हत्या के एक हफ़्ते बाद, यानी 21 नवंबर 2012 को, इज़रायल और हमास के बीच सीज़ फायर हो गया।  
 
अगर पहले का वक़्त होता, तो संघर्ष तेज़ होने पर इज़रायल को गाज़ा में अपने सैनिक तैनात करने पड़ते और हफ़्तों तक हिंसा चलती रहती। 

मगर इस दफ़ा ऐसा नहीं हुआ। इज़रायल ने इस सफलता का श्रेय दिया आयरन डोम को। जानकारों ने भी कहा कि अब फिलिस्तीनी चरमपंथी और इज़रायल, दोनों की फ़्यूचर सैन्य रणनीति का सेंटरपीस होगा आयरन डोम। 
 
ऐसा ही हुआ भी, पिछले एक दशक से आयरन डोम इज़रायल की डिफेंस स्ट्रैटजी का पोस्टरबॉय बना हुआ है.
 

आयरन डोम काम कैसे करता है How Does Iron Dome Work

 

अब ये भी जान लेते हैं कि ये काम कैसे करता है? ये डिफेंस सिस्टम कई बैटरी की बदौलत चल रहा है। यहां बैटरी का मतलब चार्ज होने वाली बैटरी बिलकुल नहीं है। रॉकेट रोकने वाले एक यूनिट को बैटरी कहते हैं। आयरन डोम के काम करने का तरीका समझने के लिए इस बैटरी के अलग-अलग हिस्सों को जानना होगा.

एक बैटरी के तीन अहम हिस्से होते हैं- रेडार, कंट्रोल सेंटर और लॉन्चर। पहला हिस्सा है रेडार, जैसे ही गाज़ा की तरफ से कोई रॉकेट फायर होता है, रेडार को तुरंत भनक लग जाती है. 

रेडार को उस रॉकेट की स्पीड और ट्रैजेक्ट्री की भी जानकारी मिल जाती है। ट्रैजेक्ट्री यानी वो रास्ता, जो रॉकेट तय करने वाला है। ये जानकारी रेडार आयरन डोम के दूसरे हिस्से को भेज देता है। 

इस दूसरे हिस्से का नाम है- कंट्रोल सेंटर, इस सेंटर में हाई स्पीड कंप्यूटर रखे होते हैं। इनकी मदद से ये अंदाज़ा लगाया जाता है कि रॉकेट कहां गिरने वाला है। अगर रॉकेट किसी आबादी वाले इलाके में या किसी महत्वपूर्ण इमारत पर गिरने वाला हो, उसे तभी रोका जाता है। 
 
अगर किसी खाली जगह या वीराने में गिरने वाला हो, तो उसे गिरने दिया जाता है। किसी रॉकेट को रोकना है या नहीं, ये फैसला कंट्रोल सेंटर में रखे कंप्यूटर लेते हैं। 

अगर कंप्यूटर को लगता है कि किसी मिसाइल को रोका जाना है, तो कंट्रोल सेंटर आयरन डोम के तीसरे हिस्से को सिग्नल भेजता है। इस तीसरे हिस्से का नाम है लॉन्चर, लॉन्चर में कई इंटरसेप्टर तैनात होते हैं। 
 
इंटरसेप्टर यानी वो मिसाइल जो हमला करने वाले रॉकेट को हवा में ख़त्म कर देगी। कंट्रोल सेंटर से सिग्नल मिलते ही तुरंत एक इंटरसेप्टर लॉन्च हो जाता है। इस इंटरसेप्टर को कंट्रोल सेंटर से लगातार गाइडेंस मिलता है। 

इस इंटरसेप्टर के अंदर भी एक छोटा सा रेडार लगा होता है।  इस इंटरनल रेडार और कंट्रोल सेंटर की मदद से इंटरसेप्टर दुश्मन के रॉकेट के पास पहुंच पाता है। रॉकेट के पर्याप्त नज़दीक पहुंचकर इंटरसेप्टर ब्लास्ट हो जाता है, और उस दुश्मन रॉकेट को हवा में ही ख़त्म कर देता है। 

रेडार, कंट्रोल सेंटर और लॉन्चर बैटरी के ये तीन हिस्से एक जगह पर मौजूद नहीं होते। ये अलग-अलग जगहों पर तैनात किए जाते हैं। इनके बीच बहुत तेज़ी से वायरलेस डेटा ट्रांसफ़र होता है। इन हिस्सों की कोई जगह तय नहीं होते ये मोबाइल, यानी चलायमान होते हैं। यानी इन्हें एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है।  

 

आयरन डोम का परफ़ॉर्मेंस Iron Dome Performance


ये तो हुआ आयरन डोम का मकैनिज़म। लेकिन क्या इसकी परफ़ॉर्मेंस पर कभी कोई सवाल नहीं उठा? 
 
बिल्कुल उठा, कई जानकारों का कहना है कि आयरन डोम उतना प्रभावी नहीं, जितना इज़रायल दावा करता है। 
 
उनका कहना है कि शुरुआती दिनों के मुकाबले आयरन डोम की क्षमता घटी है। ये पहले से कम रॉकेट्स को नष्ट करता है। कुछ एक्सपर्ट कहते हैं कि इसकी वजह शायद ये है कि आयरन डोम का सिस्टम बेहतर हुआ है। 
 
वो ज़्यादा सटीक तरीके से अनुमान लगा पा रहा है कि किस रॉकेट से ख़तरा है, किससे नहीं। चूंकि हमास के रॉकेट्स बहुत प्रिसासइली गाइडेड नहीं होते, सो आयरन डोम को कम ही रॉकेट्स में ख़तरा दिखता है।  
 
यही वजह है कि वो कम रॉकेट्स को गिराता है। आयरन डोम से जुड़ा एक सवाल लागत का भी है। इज़रायल कहता है कि आयरन डोम द्वारा एक रॉकेट गिराए जाने की लागत 37 से 65 लाख रुपये के बीच आती है। 
 
मगर कुछ एक्सपर्ट्स कहते हैं कि ये आंकड़ा ग़लत है। असल लागत डेढ़ करोड़ रुपये से ज़्यादा हो सकती है।  
 
उनका कहना है कि इज़रायली सरकार सुरक्षा के लिए ख़र्च होने वाले भारी-भरकम पैसों को जानबूझकर कम बताती है। 
 
ताकि उसपर फिलिस्तीन के साथ आक्रामकता कम करने का दबाव न बने। इस दलील को थोड़ा और बारीकी से समझते हैं। 
 
आयरन डोम की सफलता का मतलब है, संघर्ष के दौरान इज़रायल का कम-से-कम नुकसान। अगर इज़रायल को जान-माल के ज़्यादा नुकसान की आशंका हो, तो उसकी लीडरशिप फिलिस्तीन के साथ तनाव घटाने की कोशिश करेगी। 

इज़रायल के मौजूदा प्रधानमंत्री की पॉलिसी आक्रामक है। फिलिस्तीनी अधिकारों को जगह देकर विवाद झुलसाने की कोशिश नहीं करते। 
 
वो लंबे समय से फिलिस्तीन के साथ शांति वार्ता टालते आए हैं। इसकी बड़ी वजह ये है कि इज़रायल कम्फर्टेबल स्थिति में है। 
 
वो हमास जैसे संगठनों के साथ होने वाले संघर्ष से काफी हद तक ख़ुद को बचा लेता है। लेकिन जब वो गाज़ा पर बमबारी करता है, तो फिलिस्तीनियों के पास कोई डिफेंस नहीं होता है और वो मरते हैं। 
 
 
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