डालडा: कहानी एक ऐसी कंपनी की जिसने कई वर्षों तक पूरे भारत के किचन पर राज किया!

 

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आज अगर भारत की 80% जनता को बोला जाए की जा कर वनस्पति घी ले आओ तो वो मार्केट जा कर डालडा ही बोलेंगे, भले ही वो किसी भी कंपनी का वनस्पति घी ले आएं। इस बात से आप अंदाजा लगा सकते हैं की किसी ब्रांड की मार्केट वैल्यू इतनी ज्यादा थी की लोग प्रोडक्ट को उसके ब्रांड नेम से ही जानते हैं। 

 

अभी भी ज्यादातर लोगों को ये नही पता है की डालडा किसी प्रोडक्ट का नही ब्रांड का नाम है। जी हां सही समझा आपने! डालडा वास्तव में एक कंपनी का वनस्पति घी का ब्रांड नेम है। आईए जानते हैं इसका असाधारण इतिहास और फिर पतन की कहानी।

 


कैसे शुरू हुआ डालडा


डालडा का इतिहास हमारे देश के आजाद होने से भी ज्यादा पुराना है। सन् 1930 में नीदरलैंड की एक कंपनी का वनस्पति घी का ब्रांड डाडा जो की एक हाइड्रोजेनेटेड वेजिटेबल ऑयल था भारत में लाई। 

 

सन् 1937 में हिंदुस्तान लीवर ( आज की हिंदुस्तान यूनिलीवर ) कंपनी ने इस कंपनी के साथ इसे भारत में बनाने और अपने ब्रांड नेम के साथ लांच करने का अनुबंध किया। 

 

चुंकि डाडा नाम कुछ ठीक नहीं लग रहा था तो हिंदुस्तान लीवर ने अपने नाम का L इस ब्रांड के बीच में लगा कर इसका नाम डालडा कर दिया। हिंदुस्तान लीवर का कहना था की अनुबंध करने वाली कंपनी का नाम भी इसमें जुड़ा होना चाहिए। इस तरह डाडा से डालडा नाम पड़ा।

 


मार्केटिंग का नया तरीका अपनाया


हिंदुस्तान लीवर ने डालडा को शुद्ध देशी घी के सस्ते विकल्प के रुप में इसका विज्ञापन शुरू किया। हिंदुस्तान लीवर ने इसे शुद्ध देशी घी के जैसा ही बताया और इसके सस्ते होने के कारण यह धीरे धीरे भारत के निम्न और मिडिल इनकम ग्रुप के लोगों को पसंद आने लगा। 

 

पूरे भारत में हर जगह डालडा ही डालडा बिकने लगा। हालंकि उस वक्त इसको लेकर विरोध भी हुआ था और यह मामला सदन तक पहुंच गया था। लेकिन कंपनी ने यह कहा की इसी ब्रांड की वजह से वह देश में हजारों लोगों को रोजगार दे रहा है। 

 

डालडा ने ऐसे विज्ञापन तैयार करवाए जिसमें ये दिखाई दे की पूरा परिवार साथ में डालडा से बने भोजन को कर रहा है और यह पूरे परिवार के लिए फायदेमंद है। इस तरह के पारिवारिक विज्ञापन को लोगों ने बहुत पसंद किया और डालडा पूरे भारत का सबसे बड़ा ब्रांड हो गया।

 


डालडा का मार्केट में हिस्सा कैसे कम हुआ


90 के दशक तक डालडा की धाक पूरे भारत में जम चुकी थी। लेकिन धीरे धीरे अन्य कंपनीज भी वनस्पति घी का विकल्प ले कर मार्केट में आ चुकी थीं। 

 

कई कम्पनी ने अफवाह फैलाई की इसमें चर्बी मिलाई जाती है। हालंकि यह मात्र अफवाह ही रही। इसके बाद कंपनियों ने बाजार में रिफाइंड तेल लाने शुरू कर दिए थे। 

 

मूंगफली का तेल, सरसों का तेल, सूरजमुखी का तेल, तिल का तेल, सोयाबीन का तेल ईत्यादि के रिफाइंड तेल मार्केट में आ गए जो डालडा की तुलना में उस वक्त सस्ते थे। 

 

साथ ही कंप्टीटर कंपनीज ने ऐसे विज्ञापन चलाए जिसमें दिखाया गया की डालडा सेहत के लिए कितना नुकसानदेह है। 

 

यह हार्ट संबंधी बीमारियों को बढ़ाता है, इस वक्त तक धीरे धीरे लोगो में स्वास्थ के प्रति जागरूकता भी बढ़ रही थी और ये बात लोगों की समझ में आने लगी और धीरे धीरे डालडा की बिक्री कम होने लगी। 

 

रिफाइंड तेलों ने डालडा की जगह ले ली। इसी बीच सन् 2003 में हिन्दुस्तान यूनिलीवर ने डालडा को 100 करोड़ रुपए में एक अमेरिकी कंपनी Bunge को बेच दिया। 

 

हालांकि अभी भी पूरे भारत में वनस्पति घी को डालडा के नाम से ही जाना जाता है। 

 

 

 

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