मुल्ला दो प्याजा कौन था और उसका ये नाम कैसे पड़ा | Mulla Do Pyaza Kaun Tha

 

MULLA DO PYAJA KAUN THA


मुगल शासक अकबर के दरबार में अकबर के नौरत्नों में एक थे “मुल्ला दो प्याजा” और यह अकबर के सलाहकार के रूप में दरबार में नियुक्त थे। 

आईए जानते हैं कौन थे मुल्ला दो प्याजा और इनका नाम मुल्ला दो प्याजा कैसे पड़ा

मुल्ला दो प्याजा का असली नाम अब्दुल हसन था। इनके पिता अध्यापक थे और इसीलिए मुल्ला दो प्याजा की रुचि भी किताबों में ज्यादा थी।
 
मुल्ला दो प्याजा का सपना था की वो अकबर के दरबार में रहें और इसके लिए उन्होने काफी संघर्ष भी किया और तिकड़म भी लगाए। 
 
दरबार में घुसने के लिए सबसे पहले उन्होने शाही मुर्गी खाना में प्रभारी के पद पर काम शुरू किया। 
 
उन्होंने काम बहुत चालाकी से किया और मुर्गियों को वो खाना खिलाया जो शाही रसोई में बच जाता था। 
 
इससे हुआ ये की मुर्गियों के भोजन में किया जानें वाला खर्चा बहुत कम हो गया और खाते में काफी बचत हुई। इससे अकबर ने प्रभावित होकर मुल्ला दो प्याजा को शाही पुस्तकालय की जिम्मेदारी सौंप दी। 
 
मुल्ला दो प्याजा इससे खुश नहीं थे क्योंकि उनको दरबार में जगह बनानी थी। 
 
दरबार में जो तोहफे में मखमल के कपड़े मिलते थे उसको इखट्टा करके मुल्ला दो प्याजा ने पुस्तकालय के पर्दे बनवा दिए। 
 
जब अकबर पुस्तकालय जाता तो पुस्तकालय देखकर खुश हो जाता और उसने खुश होकर मुल्ला दो प्याजा को दरबार में शामिल कर लिया। 

कैसे पड़ा मुल्ला दो प्याजा नाम

अब्दुल हसन का नाम मुल्ला दो प्याजा होने की घटना भी अनोखी है।
 
एक दिन दरबार में शामिल फैजी ने अब्दुल हसन को खाने पर बुलवाया और मुर्गे का मांस बनवाया। 
 
यह मुर्गे का मांस अब्दुल हसन को बहुत पसन्द आया और जब अब्दुल हसन ने इसका नाम पूछा तो फैजी ने इसका नाम “मुर्ग दो प्याजा” बताया। 
 
यह अब्दुल हसन को इतना पसंद आया की जब भी दावत होती तो यह “मुर्ग दो प्याजा” अब्दुल हसन के लिए जरूर बनता था। 
 
जब अकबर ने शाही रसोई की जिम्मेदारी अब्दूल हसन को सौंपी तो अब्दूल हसन ने “मुर्ग दो प्याजा” बनवाकर अकबर को भी खिलाया और अकबर को यह इतना पसन्द आया की अकबर ने अब्दूल हसन का नाम “दो प्याजा” रख दिया। 
 
चुंकि अब्दुल हसन मस्जिद में ईमाम भी रह चुके थे तो लोग इन्हें मुल्ला भी कहते थे। इस तरह अब्दुल हसन का नाम मुल्ला दो प्याजा पड़ गया। 
 
मुल्ला दो प्याजा ने हजारों हिंदुओं का जबरन तलवार की नोक पर मुस्लिम मजहब में धर्मांतरण करवाया था।
 
 

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